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Sunday, June 9, 2013

चक्र ज्ञान : सहस्रार


सहस्रार चक्र

तत्त्व : सर्व तत्व

राग : दरबारी और भैरवी

गुण : निर्विचारिता, निरानंद, परमशांती, आत्मसाक्षात्कार, सामूहिक चेतना और आनंद

नियंत्रित अंग : तालू क्षेत्र

मस्तिष्क या तालू क्षेत्र स्थित हजार पंखुडियों वाला ये चक्र सहस्रार चक्र कहलाता हैं। वास्तव में इसमे इक हज़ार नाडियाँ हैं। आप यदि मस्तिष्क को आड़ा काटें तो सुंदर पंखुडियों की शक्ल में सहस्रदल कमल बनाती हुई इन नाड़ियों को आप देख सकते हैं। आत्मसाक्षात्कार से पूर्व बंद-कमल की तरह ये चक्र मस्तिष्क के तालू क्षेत्र को आच्छादित करता हैं।
जागृत होकर कुण्डलिनी जब इस चक्र का भेदन करती हैं तो सारी नाडियाँ भी जागृत हो जाती हैं और सभी नाडी केन्द्रों को ज्योतिर्मय करती हैं और हम कहते हैं के व्यक्ति आत्म-साक्षात्कारी (ज्योतिर्मय) हैं। तालू क्षेत्र का अधिक भेदन करके कुण्डलिनी ब्रम्हांड में एक मार्ग खोलती हैं और इस हम सर पे शीतल चैतन्य-लहरियों के रूप में अनुभव करते हैं। यह योग का वस्ताविकरण हैं, परमात्मा की सर्वव्यापी शक्ति से एकाकारिता (आत्म-साक्षात्कार)

चक्र ज्ञान : आज्ञा


आज्ञा चक्र

तत्त्व : प्रकाश तत्त्व

राग : बागेश्री और भूप

गुण : क्षमाशिलता, करुना, अहिंसा

नियंत्रित अंग : दृष्टी, द्रुकअन्तःपुर, अल्पअन्तःपुर 
 
दो पंखुडियों के इस चक्र का नाम आज्ञा चक्र हैं. मस्तिष्क में जहाँ एक दुसरे को पार करती हैं वह आज्ञा चक्र का स्थान हैं. ये चक्र पियूष तथा शंकुरूप ग्रंथियों की देखभाल करता हैं. ये ग्रंथियां शरीर में अहं तथा प्रतिअहं नाम की संस्थाओ की अभिव्यक्ति करती हैं.
क्योंकि ये चक्र आँखों की भी देखभाल करता हैं इसलिए सिनेमा, कंप्यूटर, टेलिविज़न, पुस्तकों आदि पर हर समय दृष्टी गडाये रखना इस चक्र को दुर्बल करता हैं. बहुत अधिक मानसिक व्यायाम एवं बौद्धिक कलाबाजियां इस चक्र को अवरोधित करती हैं और व्यक्ति के अन्दर अहं-भाव विकसित हो जाता हैं.
कुण्डलिनी जब इस चक्र का भेदन करती हैं तो व्यक्ति एकदम से निर्विचार और क्षमाशील बन जाता हैं. निर्विचारिता एवं क्षमाशीलता इस चक्र का सार है, अर्थात ये चक्र हमें क्षमा की शक्ति प्रदान करता हैं.

चक्र ज्ञान : विशुद्धि


विशुद्धि चक्र


तत्त्व : आकाश तत्त्व

राग : जयजयवंती

गुण : संपर्क कुशलता, सत्यनिष्ठ, व्यवहार कुशलता, विनम्रता, कूटनितिज्ञता, माधुर्य, साक्षीभाव, सभी के लिए निरासक्त प्रेम

नियंत्रित अंग : मुँह, कान, नाक, दात, जिह्वा, मुखाकृति, ग्रीवा तथा वाणी

मेरुरज्जु के ग्रीवा क्षेत्र में स्थापित सोलह पंखुडियों वाला ये चक्र विशुद्धि चक्र कहलाता हैं। यह ग्रीवा चक्र के अनुरूप है जो नाक, कान, गला, गर्दन, दात, जिह्वा, हात एवं भाव भंगिमाओं आदि के कार्यों को नियमित करता हैं। ये चक्र अन्य लोगों से संपर्क के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि इन्ही अंगो के माध्यम से हम अन्य लोगों से संपर्क स्थापित करते हैं।
शारीरिक स्तर पर यह गल-ग्रंथि के कार्य को नियंत्रित करता हैं। कटुवाणी, धुम्रपान, बनावटी व्यवहार एवं अपराध-भाव इस केन्द्र को अवरोधित करते हैं।
कुण्डलिनी जब इस चक्र का भेदन करती है तो व्यक्ति अपने व्यवहार में अत्यन्त सत्यानिष्ट, कुशल एवं मधुर हो जाता है और व्यर्थ के तर्क-वितर्क में नहीं फंसता। बिना अहम् को बढ़ावा दिए परिस्थितियों पर नियंत्रण करने में वह अत्यन्त युक्ति-कुशल हो जाता हैं।

चक्र ज्ञान : अनाहत



अनाहत चक्र

तत्त्व : वायु तत्त्व
 
राग : भैरवी और दुर्गा
 
गुण : प्रेम, करुना, सुरक्षा, हितेषिता
 
नियंत्रित अंग : ह्रदय, फेफडे, रक्तदबाव
 
बिगाड़ से होने वाले दुष्परिणाम : हृदयरोग, श्वासोश्वास सम्बन्धी रोग, अस्थमा

बारह पंखुडियों वाला ये चक्र अनाहत कहलाता है और मेरुरज्जू में उरोस्थि के पीछे इसका स्थान हैं। ये चक्र ह्रदय चक्र के अनुरूप हैं जो बारह वर्ष की आयु तक रोग प्रतिकारक पैदा करता हैं। तत्पश्चात ये रोग प्रतिकारक हमारे शरीर तंत्र में फ़ैल जाते हैं और शरीर या मस्तिष्क पर होने वाले किसी भी आक्रमण का मुकाबला करते हैं। व्यक्ति पर भावनात्मक या शारीरिक आक्रमण स्थिति में उरोस्थि के माध्यम से रोग प्रतिकारको को सुचना दी जाती हैं क्योंकि उरोस्थि ही सुचना प्रसारण का दूरस्थ नियंत्रण केन्द्र हैं। ह्रदय तथा फेफडों की कार्य प्रणाली का नियमन करते हुए ये केन्द्र श्वास प्रक्रिया को नियंत्रण करता हैं।
कुण्डलिनी जब इस चक्र का भेदन करती है तो व्यक्ति अत्यन्त आत्म-विश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यन्त हितेषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता हैं।

चक्र ज्ञान : मणिपुर


मणिपुर चक्र


तत्त्व - अग्नि तत्व

राग - अभोगी भटियार 
 
कार्य - पेट, आंत, लीवर, पाचनशक्ति संभालना 
 
शरीर में स्थान - नाभि

चक्र के बिघाड से आने वाले दोष - असमाधानी स्वभाव, अतृप्त स्वभाव, कंजूस, पति अथवा पत्नी पे रोब जमाना।

गुण - पारिवारिक सुख संपन्नता विकास, सामाजिक विकास, नैतिकता, अच्छा साफ़ चरित्र।

ख़राब होने के कारण - पैसे का हेराफेरी, कंजूसी, खाने में चित्त होना, घर-गृहस्थी एवं धन की ज्यादा चिंता करना,

विवरण - मणिपुर चक्र के दस पंखुडियाँ हैं। बढ़ते समृद्धि के साथ लोग और भी पैसे के पीछे भागते हैं। उस वजह से इस चक्र में तनाव एवं कठिनाइयाँ आते हैं। भौतिक सुख के पीछे भागना, मित आहार, आर्थिक अव्यवस्था आदि इस चक्र के बिघाड के लिए कारक होते हैं।

चक्र ज्ञान : स्वाधिष्ठान

स्वाधिष्ठान चक्र


तत्त्व - जल तत्त्व

गुण - निर्मल विद्या एवं निर्मल इच्छा चित्त

शरीर में स्थान - मूलाधार के ऊपर और नाभि के नीचे, किडनी, यकृत

स्वभाव के वजह से चक्र में आने वाले दोष - बहोत अतिरेकी स्वभाव

कार्य - गर्भपेशी, किडनी, लीवर इन सबका नियंत्रण करना, मस्तिष्क को सोचने के शक्ति देना

खराबी आने की वजह - बहोत ज्यादा सोचना, अति-नियोजन, तम्बाखू अवं अति दवाई का सेवन करना, भविष्यके बारे 
में बहोत ज्यादा सोचना, अहंकारी स्वभाव, अगुरु (ढोंगी गुरु) एवं तांत्रिक लोगो के पास जाना।

परिणाम - मधुमेह, गॅसेस, अशुद्ध चित्त, किडनी और लीवर से सम्बंधित रोग आदि।

विवरण - स्वाधिष्ठान चक्र के छह पंखुडियाँ हैं। निर्मिती के लिए, सोचने के लिए, भविष्य के बारे में सोचने के लिए यह केन्द्र मस्तिष्क को शक्ति पहुँचाता है।

चित्त का स्थान केवल मस्तिष्क में नही बल्कि लीवर में होता हैं इसी लिए मद्यपान करने से मानवी चित्त घुमता रहता हैं और लीवर में बिघाड़ हो जाता हैं। इस चक्र के बाएँ तरफ़ शुद्ध विद्या का स्थान हैं। इस का नियंत्रण शुद्धज्ञान देने वाले देवता करते हैं जिसके वजह से हम में सौंदर्य दृष्टी विकसित होती हैं।