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Tuesday, February 14, 2017

अहम् ब्रह्मास्मि


मैं ही सृष्टि का परम सत्य
मैं ही तत्वों का मूल तत्व 
मैं ही जीवन में सहज दीप्त
उस महाशून्य में मैं ही गुप्त
मेरा जो अंश तुम्हें दिखता है
वह नित्य लीलाएं रचता है
तु भूतकाल में मुझे जान
मैं ही करता भविष्य निर्माण
है वर्तमान मेरा विस्तार
मैं ही समय का उभय द्वार
तु इस तरह से मुझे जान
जबसे यह सृष्टि का विधान
मैं ही चेतन और प्राणवान
मैं ही प्रकट और अंतर्धान
मैं ही सृजन संचालक हूँ
मैं योग छेम का धारक हूँ
मैं ही भूतों का कारक हूँ
उनका अस्तित्व सँवारक हूँ
मुझको ही वेद बताते हैं
गीता का ज्ञान सिखाते हैं
सब मुझसे ही तो आते हैं
फिर वापस भी मिल जाते हैं

मैं ही अंतः आरोढ़ित हूँ
मैं ही माया से गोपित हूँ 
मैं ही इंग्ला मैं ही पिंगला
मैं कुंडलिनी मैं मूलाधार
मैं ही काया में ब्रह्म द्वार
मैं ही हूँ जग के आर पार
जो देख रहा वह मैं ही हूँ
जो देख सके वह भी मैं हूँ
जो दृश्य नहीं उसमें भी मैं
हर श्रवण शब्द में मैं ही हूँ
जो श्रव्य नहीं, है मेरा नाद
जो पराश्रव्य मेरा ही भाग
जिसे मनन करे वह मैं ही हूँ
जो मनन करे वह भी मैं हूँ
मैं ही तप कर तो मुनी बना
गुण ज्ञान कमाकर गुणी बना
हर तपसी का तापस हूँ मैं
हर वीरों का ओजस हूँ मैं
मैं हूँ ज्ञानी का ज्ञानयोग
मैं ही ध्यानी का ध्यानयोग
जो हवन किया वह मैं ही था
जो हवन हुआ वह भी मैं हूँ
जो ज्ञात नहीं वह मैं ही हूँ
जो आत्मसात वह भी मैं हूँ
सत रज तम मुझे बताते हैं
सब भूत इसी में आते हैं
मुझको पाने का मार्ग सरल
रहना उस पथ पर सदा अचल
जो एक बार मिल जाता है
फिर मैं ही वह हो जाता है 

मेरा ही रुप निरंतर है
जग के बाहर और अंदर है 
अब मेरे भाव का नाम सुन
उनका प्रमुदित व्याख्यान सुन
मैं जो तुम्हें बताता हूँ
वह गूढ़ रहस्य सुनाता हूँ
मैं ही काली, मैं ही दुर्गा
मैं ही लक्ष्मी मैं सरस्वती
मैं शिव शंभू मैं महाकाल
मैं हूँ ब्रह्मा मैं इन्द्रजाल
मैं हूँ कुबेर का विपुल धन
मैं ही नारद का अचल मन
मैं हूँ अंजनी का पवनपुत्र
मैं ही लव कुश, सीता सुपुत्र
मैं हूँ ऋषियों का मोक्ष मंत्र
मुझसे ही उनका सारा तंत्र
मेरा ही भाव वे भजते हैं
जग छोड़ छाड़कर रमते हैं
मैं दुर्वासा मैं विश्वामित्र
मैं हूँ वशिष्ठ मैं ही अत्रि
मैं सावित्री मैं सीता हूँ
मैं मोक्ष दायिनी गीता हूँ
माँ अनुसूया का बालक मैं
उस मातृछाया का गायक मैं
मुझसे ही रघुकूल रीति है
मुझसे श्रीकृष्ण की नीति है
मैं गुरु पुजा की विधि हूँ
शिष्यों का अमूल्य निधि हूँ
मैं ॐ भी हूँ और स्वाहा भी
पुरा भी मैं और आधा भी
मैं हूँ अयप्पा का ब्रह्मचर्य
मैं ही ध्रुव का हूँ तपश्चर्य
मैं ही हनुमत का राम नाम
मैं ही उधो का मधुर श्याम
मुझको मीरा ने पाया है
सुर-तुलसी ने भी गाया है
मैं ही गंधर्व अधिनायक हूँ
मैं ही कोटि फलदायक हूँ
मैं ही शक्ति का वाहक हूँ
मैं ही सिंहों का शावक हूँ
मैं ही वन का राजा मृगेंद्र
मैं ही देवों का हूँ देवेंद्र
मैं ही सरिता में हूँ प्रवाल
मैं ही मृगों का चपल चाल
मैं जीवन का सुख दर्पण हूँ
सबका ही सदा समर्पण हूँ

Sunday, June 9, 2013

चक्र ज्ञान : सहस्रार


सहस्रार चक्र

तत्त्व : सर्व तत्व

राग : दरबारी और भैरवी

गुण : निर्विचारिता, निरानंद, परमशांती, आत्मसाक्षात्कार, सामूहिक चेतना और आनंद

नियंत्रित अंग : तालू क्षेत्र

मस्तिष्क या तालू क्षेत्र स्थित हजार पंखुडियों वाला ये चक्र सहस्रार चक्र कहलाता हैं। वास्तव में इसमे इक हज़ार नाडियाँ हैं। आप यदि मस्तिष्क को आड़ा काटें तो सुंदर पंखुडियों की शक्ल में सहस्रदल कमल बनाती हुई इन नाड़ियों को आप देख सकते हैं। आत्मसाक्षात्कार से पूर्व बंद-कमल की तरह ये चक्र मस्तिष्क के तालू क्षेत्र को आच्छादित करता हैं।
जागृत होकर कुण्डलिनी जब इस चक्र का भेदन करती हैं तो सारी नाडियाँ भी जागृत हो जाती हैं और सभी नाडी केन्द्रों को ज्योतिर्मय करती हैं और हम कहते हैं के व्यक्ति आत्म-साक्षात्कारी (ज्योतिर्मय) हैं। तालू क्षेत्र का अधिक भेदन करके कुण्डलिनी ब्रम्हांड में एक मार्ग खोलती हैं और इस हम सर पे शीतल चैतन्य-लहरियों के रूप में अनुभव करते हैं। यह योग का वस्ताविकरण हैं, परमात्मा की सर्वव्यापी शक्ति से एकाकारिता (आत्म-साक्षात्कार)

चक्र ज्ञान : आज्ञा


आज्ञा चक्र

तत्त्व : प्रकाश तत्त्व

राग : बागेश्री और भूप

गुण : क्षमाशिलता, करुना, अहिंसा

नियंत्रित अंग : दृष्टी, द्रुकअन्तःपुर, अल्पअन्तःपुर 
 
दो पंखुडियों के इस चक्र का नाम आज्ञा चक्र हैं. मस्तिष्क में जहाँ एक दुसरे को पार करती हैं वह आज्ञा चक्र का स्थान हैं. ये चक्र पियूष तथा शंकुरूप ग्रंथियों की देखभाल करता हैं. ये ग्रंथियां शरीर में अहं तथा प्रतिअहं नाम की संस्थाओ की अभिव्यक्ति करती हैं.
क्योंकि ये चक्र आँखों की भी देखभाल करता हैं इसलिए सिनेमा, कंप्यूटर, टेलिविज़न, पुस्तकों आदि पर हर समय दृष्टी गडाये रखना इस चक्र को दुर्बल करता हैं. बहुत अधिक मानसिक व्यायाम एवं बौद्धिक कलाबाजियां इस चक्र को अवरोधित करती हैं और व्यक्ति के अन्दर अहं-भाव विकसित हो जाता हैं.
कुण्डलिनी जब इस चक्र का भेदन करती हैं तो व्यक्ति एकदम से निर्विचार और क्षमाशील बन जाता हैं. निर्विचारिता एवं क्षमाशीलता इस चक्र का सार है, अर्थात ये चक्र हमें क्षमा की शक्ति प्रदान करता हैं.

चक्र ज्ञान : विशुद्धि


विशुद्धि चक्र


तत्त्व : आकाश तत्त्व

राग : जयजयवंती

गुण : संपर्क कुशलता, सत्यनिष्ठ, व्यवहार कुशलता, विनम्रता, कूटनितिज्ञता, माधुर्य, साक्षीभाव, सभी के लिए निरासक्त प्रेम

नियंत्रित अंग : मुँह, कान, नाक, दात, जिह्वा, मुखाकृति, ग्रीवा तथा वाणी

मेरुरज्जु के ग्रीवा क्षेत्र में स्थापित सोलह पंखुडियों वाला ये चक्र विशुद्धि चक्र कहलाता हैं। यह ग्रीवा चक्र के अनुरूप है जो नाक, कान, गला, गर्दन, दात, जिह्वा, हात एवं भाव भंगिमाओं आदि के कार्यों को नियमित करता हैं। ये चक्र अन्य लोगों से संपर्क के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि इन्ही अंगो के माध्यम से हम अन्य लोगों से संपर्क स्थापित करते हैं।
शारीरिक स्तर पर यह गल-ग्रंथि के कार्य को नियंत्रित करता हैं। कटुवाणी, धुम्रपान, बनावटी व्यवहार एवं अपराध-भाव इस केन्द्र को अवरोधित करते हैं।
कुण्डलिनी जब इस चक्र का भेदन करती है तो व्यक्ति अपने व्यवहार में अत्यन्त सत्यानिष्ट, कुशल एवं मधुर हो जाता है और व्यर्थ के तर्क-वितर्क में नहीं फंसता। बिना अहम् को बढ़ावा दिए परिस्थितियों पर नियंत्रण करने में वह अत्यन्त युक्ति-कुशल हो जाता हैं।

चक्र ज्ञान : अनाहत



अनाहत चक्र

तत्त्व : वायु तत्त्व
 
राग : भैरवी और दुर्गा
 
गुण : प्रेम, करुना, सुरक्षा, हितेषिता
 
नियंत्रित अंग : ह्रदय, फेफडे, रक्तदबाव
 
बिगाड़ से होने वाले दुष्परिणाम : हृदयरोग, श्वासोश्वास सम्बन्धी रोग, अस्थमा

बारह पंखुडियों वाला ये चक्र अनाहत कहलाता है और मेरुरज्जू में उरोस्थि के पीछे इसका स्थान हैं। ये चक्र ह्रदय चक्र के अनुरूप हैं जो बारह वर्ष की आयु तक रोग प्रतिकारक पैदा करता हैं। तत्पश्चात ये रोग प्रतिकारक हमारे शरीर तंत्र में फ़ैल जाते हैं और शरीर या मस्तिष्क पर होने वाले किसी भी आक्रमण का मुकाबला करते हैं। व्यक्ति पर भावनात्मक या शारीरिक आक्रमण स्थिति में उरोस्थि के माध्यम से रोग प्रतिकारको को सुचना दी जाती हैं क्योंकि उरोस्थि ही सुचना प्रसारण का दूरस्थ नियंत्रण केन्द्र हैं। ह्रदय तथा फेफडों की कार्य प्रणाली का नियमन करते हुए ये केन्द्र श्वास प्रक्रिया को नियंत्रण करता हैं।
कुण्डलिनी जब इस चक्र का भेदन करती है तो व्यक्ति अत्यन्त आत्म-विश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यन्त हितेषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता हैं।

चक्र ज्ञान : मणिपुर


मणिपुर चक्र


तत्त्व - अग्नि तत्व

राग - अभोगी भटियार 
 
कार्य - पेट, आंत, लीवर, पाचनशक्ति संभालना 
 
शरीर में स्थान - नाभि

चक्र के बिघाड से आने वाले दोष - असमाधानी स्वभाव, अतृप्त स्वभाव, कंजूस, पति अथवा पत्नी पे रोब जमाना।

गुण - पारिवारिक सुख संपन्नता विकास, सामाजिक विकास, नैतिकता, अच्छा साफ़ चरित्र।

ख़राब होने के कारण - पैसे का हेराफेरी, कंजूसी, खाने में चित्त होना, घर-गृहस्थी एवं धन की ज्यादा चिंता करना,

विवरण - मणिपुर चक्र के दस पंखुडियाँ हैं। बढ़ते समृद्धि के साथ लोग और भी पैसे के पीछे भागते हैं। उस वजह से इस चक्र में तनाव एवं कठिनाइयाँ आते हैं। भौतिक सुख के पीछे भागना, मित आहार, आर्थिक अव्यवस्था आदि इस चक्र के बिघाड के लिए कारक होते हैं।